ट्रांसफर के चार महीने बाद भी सूरजपुर जिला अस्पताल में जमे ‘लाडले’ लेखपाल… सचिव के आदेश, जनप्रतिनिधियों के निर्देश और सिस्टम सब बेअसर!

सूरजपुर। जिले के सिविल अस्पताल में पदस्थ सहायक ग्रेड-2 संजय सिन्हा का स्थानांतरण हुए चार महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन विभागीय आदेश और सचिव के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद वे अब तक अपनी मूल पदस्थापना से हटने को तैयार नहीं हैं। 26 जून 2025 को जारी आदेश में उन्हें उनके गृहग्राम पटना सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में स्थानांतरित किया गया था, परंतु वे आज भी जिला सिविल सर्जन अस्पताल में लेखपाल के पद पर जमे हुए हैं।

विभागीय सचिव ने 11 जुलाई 2025 को एक और आदेश जारी कर स्थानांतरण पालन को अनिवार्य बताया था और यह भी उल्लेख किया था कि आदेश की अवहेलना की स्थिति में अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाएगी। इसके बावजूद संजय सिन्हा ने उच्चाधिकारियों के बीच यह प्रचारित किया कि उन्हें हाईकोर्ट से स्थगन (स्टे) मिल गया है। बाद में स्पष्ट हुआ कि यह पूरी तरह भ्रामक जानकारी थी।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में केवल यह कहा था कि संबंधित कर्मचारी अपनी बात विभागीय समिति के समक्ष रख सकता है। इसके बावजूद कुछ जिम्मेदार अधिकारी भी इस भ्रामक प्रचार में सुर मिलाते रहे और सिन्हा के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश करते रहे।

इधर, सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा गठित समिति ने उन कर्मचारियों के आवेदन पर विचार कर रिपोर्ट प्रस्तुत की जिनका स्थानांतरण निरस्त या संशोधित किया जाना था। विभाग ने 9 सितंबर 2025 को 47 कर्मचारियों की सूची जारी की, जिनका स्थानांतरण रद्द या बदला गया। लेकिन इस सूची में सूरजपुर के “लाडले” लेखपाल संजय सिन्हा का नाम शामिल नहीं था। इसका अर्थ साफ है कि उनके स्थानांतरण आदेश अब भी प्रभावी हैं और वे सूरजपुर में पदस्थ रहने के अधिकारी नहीं हैं।

इसके बावजूद जिला सिविल सर्जन अस्पताल में वे आज भी कार्यरत हैं। इतना ही नहीं, 7 अक्टूबर 2025 को अस्पताल अधीक्षक द्वारा एक आदेश जारी कर संजय सिन्हा को फिर से लेखा शाखा, पेंशन शाखा, स्टेशनरी और लीगल शाखा की जिम्मेदारी सौंप दी गई। यानी, जिन पर कार्यमुक्ति का आदेश था, उन्हें दोबारा वही जिम्मेदारी दे दी गई , यह विभागीय अनुशासन पर सीधा प्रश्नचिह्न है।

जनप्रतिनिधियों का पत्र भी बेअसर

जिला पंचायत अध्यक्ष चंद्रमणि देवपाल पैकरा ने भी संभागीय संयुक्त संचालक, स्वास्थ्य सेवाएं को पत्र लिखकर संजय सिन्हा के विरुद्ध कार्यवाही की मांग की थी। उन्होंने पत्र में उल्लेख किया था कि शासन के आदेश का पालन न करना गंभीर अनुशासनहीनता है और इससे सरकारी तंत्र की साख पर आंच आती है। परंतु सूरजपुर जिला अस्पताल में न तो विभागीय सचिव के आदेशों का पालन हो रहा है, न जनप्रतिनिधियों के निर्देशों का। यहां तक कि सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी स्थानांतरण सूची की भी खुलेआम अनदेखी की जा रही है।

विभाग के भीतर नियमों से अधिक व्यक्तिगत प्रभाव हावी

सूत्र बताते हैं कि जिला अस्पताल में लंबे समय से जमे कुछ अधिकारी एक-दूसरे के हित साधने की नीति पर चल रहे हैं। यही वजह है कि विभाग के भीतर नियमों से अधिक व्यक्तिगत प्रभाव हावी है। चर्चा यह भी है कि जिला स्वास्थ्य विभाग में राजनीतिक संरक्षण प्राप्त कुछ कर्मचारी वर्षों से ट्रांसफर आदेशों के बावजूद यथावत कार्यरत हैं।

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या सूरजपुर की स्वास्थ्य व्यवस्था राज्य सरकार के आदेशों से अलग होकर अपने नियमों पर चल रही है? क्या सचिव और सामान्य प्रशासन विभाग के निर्देशों को यहां के अधिकारी महज कागज का टुकड़ा समझ रहे हैं?

जिले में यह चर्चा आम हो चुकी है कि “सूरजपुर जिला अस्पताल” में न तो शासन का आदेश चलता है, न प्रशासन का। बल्कि यहां वे अधिकारी और कर्मचारी हावी हैं, जो राजनीतिक समर्थन या व्यक्तिगत नजदीकियों के बल पर प्रणाली को अपने हिसाब से संचालित कर रहे हैं।

राज्य सरकार ने  साफ निर्देश दिए हैं कि स्थानांतरण आदेशों का पालन हर हाल में किया जाए और उल्लंघन की स्थिति में जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्यवाही हो। इसके बावजूद सूरजपुर में नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

प्रदेश में सुशासन की सरकार है, पर सवाल यह है कि क्या यह सुशासन सूरजपुर तक पहुंचा है? जहां आदेशों की अनदेखी खुलेआम हो रही है, और एक कर्मचारी के बचाव में पूरा तंत्र झुकता नजर आता है। बहरहाल, यह मामला अब सिर्फ एक कर्मचारी के ट्रांसफर का नहीं रहा, बल्कि यह उदाहरण बन गया है कि कैसे प्रशासनिक तंत्र में नियमों के ऊपर प्रभावशाली लोगों की पकड़ अधिक मजबूत है।

अब जनता पूछ रही है- “क्या सूरजपुर सरकार से अलग है?

जिले में यह मुद्दा चर्चा का विषय बन गया है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या जिला अस्पताल राज्य शासन से अलग नियमों पर काम कर रहा है? क्या विभागीय सचिव, मंत्री और जनप्रतिनिधि के आदेशों की यहां कोई अहमियत नहीं?

बहरहाल, अब गेंद सरकार के पाले में है। अगर इस मामले पर सख्त कदम नहीं उठाया गया, तो यह उदाहरण अन्य जिलों के लिए गलत संदेश बन जाएगा कि “आदेश केवल दिखावे के लिए हैं।”

खबरें और भी हैं...

फॉलो करें

64,000FansLike
47FollowersFollow
5,480SubscribersSubscribe

ट्रेंडिंग

WhatsApp Icon चैनल से जुड़ें