बिट्टू सिंह राजपूत ,सूरजपुर। छत्तीसगढ़ का सूरजपुर जिला लंबे समय से स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और अव्यवस्था के लिए चर्चा में रहा है। जिला अस्पताल की हालत आम जनता के सामने किसी से छिपी नहीं है। लेकिन इन दिनों अस्पताल में पदस्थ सहायक ग्रेड-2 संजय सिन्हा का मामला जिलेभर में सुर्खियों में है। ग्रामीणों से लेकर कर्मचारी तक सवाल कर रहे हैं कि आखिर ट्रांसफर के बावजूद भी श्री सिन्हा को सूरजपुर से क्यों नहीं रिलीव किया जा रहा है?

ट्रांसफर के बाद भी सूरजपुर में डटे
जानकारी के अनुसार, राज्य शासन ने सहायक ग्रेड-2 संजय सिन्हा का तबादला उनके गृहग्राम कोरिया जिले के पटना स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में किया था। यह स्थान उनके घर के बेहद नजदीक है। बावजूद इसके, श्री सिन्हा रोजाना 30 किलोमीटर की दूरी तय कर सूरजपुर जिला अस्पताल ही आ रहे हैं। आमतौर पर देखा जाता है कि कर्मचारी गृहग्राम या आसपास पदस्थापना के लिए प्रयास करते हैं, मगर सिन्हा का मामला बिल्कुल विपरीत है। यही वजह है कि जिलेभर में यह मामला चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
हाईकोर्ट का निर्देश, फिर भी समिति चुप
सूत्रों ने बताया कि ट्रांसफर के बाद श्री सिन्हा ने हाईकोर्ट में स्टे लेने की कोशिश की थी। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि विभागीय समिति के समक्ष अपील करें और समिति दो सप्ताह के भीतर निर्णय ले। लेकिन दो माह से अधिक समय बीत जाने के बाद भी समिति चुप्पी साधे बैठी है। आश्चर्य की बात यह है कि विभागीय अधिकारी भी उन्हें रिलीव करने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे। उल्टा, जब कोई इस विषय में सवाल करता है तो अधिकारी ‘हाईकोर्ट में स्टे है’ कहकर बात टाल देते हैं।
बीमारी का हवाला या कोई और वजह?
बताया जाता है कि संजय सिन्हा अपने स्वास्थ्य संबंधी कारणों का हवाला देकर सूरजपुर में पदस्थ बने रहना चाहते हैं। लेकिन जानकारों का कहना है कि जिन बीमारियों का हवाला दिया जा रहा है, उनका इलाज बैकुंठपुर जिला अस्पताल में भी उपलब्ध है, जो उनके घर के काफी नजदीक है। ऐसे में रोज 30 किमी की यात्रा कर सूरजपुर आना संदेह पैदा करता है।
भ्रष्टाचार की चर्चाएँ तेज
जिले में यह भी चर्चा है कि सूरजपुर जिला अस्पताल न छोड़ने के पीछे असली कारण स्वास्थ्य विभाग में आने वाली योजनाओं की भारी-भरकम राशि है। सूत्रों का कहना है कि विभागीय खरीद में पसंदीदा वेंडरों से सामान लेकर कमीशन की बड़ी रकम वसूली जाती है। यही वजह है कि कुछ अधिकारी भी उन्हें यहीं बनाए रखना चाहते हैं। कायाकल्प जैसी योजनाओं की यदि निष्पक्ष जांच हो जाए, तो बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का खुलासा संभव है।
संपत्ति को लेकर उठे सवाल
सिर्फ ट्रांसफर ही नहीं, बल्कि श्री सिन्हा की आर्थिक स्थिति भी सवालों के घेरे में है। विभागीय हलकों में चर्चा है कि सूरजपुर में लंबे समय से पदस्थ रहने के दौरान उन्होंने तन्ख्वाह से कहीं अधिक संपत्ति अर्जित की है। स्वास्थ्य विभाग में पहले भी इसी तरह के आरोप सामने आ चुके हैं। पूर्व में सीएमएचओ कार्यालय के बाबू जेम्स बेक का नाम इसी प्रकार सुर्खियों में रहा था। अब संजय सिन्हा का नाम भी उसी सूची में जुड़ गया है।
जिला अस्पताल की छवि पर असर
एक ओर जहां जिला अस्पताल में दवाइयों और डॉक्टरों की कमी से मरीज परेशान रहते हैं, वहीं दूसरी ओर बाबू वर्ग पर भ्रष्टाचार के आरोप लगना विभाग की छवि को और धूमिल करता है। आम जनता यह सवाल पूछ रही है कि आखिर शासन-प्रशासन ऐसे कर्मचारियों पर कार्रवाई करने से क्यों बच रहा है?
आगे क्या?
फिलहाल, हाईकोर्ट की स्टे वाली बात कितनी सच्ची है और समिति आखिर कब निर्णय लेगी, यह बड़ा सवाल है। लेकिन इतना तय है कि बीमारी का बहाना देकर सूरजपुर में टिके रहने की वजह कहीं न कहीं विभाग से मिलने वाली करोड़ों की राशि का मोह ज्यादा प्रतीत होता है। आम जनता अब उम्मीद लगाए बैठी है कि इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच हो और हकीकत सामने आए।



