हाथोर समाचार , सूरजपुर। सरकार के स्वच्छ भारत मिशन के नारे जहां देश को साफ-सुथरा बनाने का दावा करते हैं, वहीं सूरजपुर जिले के प्रतापपुर जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत कोटया में यही नारे अब एक कड़वी हकीकत का मज़ाक उड़ाते नजर आ रहे हैं। यहां बना सामुदायिक शौचालय बाहर से रंगीन और आकर्षक जरूर दिखता है, लेकिन अंदर घुसते ही भ्रष्टाचार की बदबू साफ महसूस होती है।

लाखों रुपये की लागत से डुमरिया पारा में 4-5 साल पहले बनाए गए इस शौचालय से ग्रामीणों को उम्मीद थी कि अब उन्हें खुले में शौच के लिए नहीं जाना पड़ेगा। लेकिन यह उम्मीद जल्द ही टूट गई। हकीकत यह है कि पंचायत सचिव, सरपंच और जनपद के जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत से यह योजना जमीन पर नहीं, सिर्फ कागजों में पूरी कर दी गई।
बाहर चकाचक, अंदर खंडहर
शौचालय की दीवारों पर चमकदार रंग-रोगन और बड़े-बड़े स्लोगन ग्रामीणों को स्वच्छता का संदेश देते हैं, लेकिन अंदर न पानी है, न शौच की कोई व्यवस्था। सेप्टिक टैंक के नाम पर सिर्फ 5 इंच की अधूरी दीवार खड़ी है, जो अब गिरने की कगार पर है।
ग्रामीण जब सरपंच और सचिव से शिकायत करते हैं तो उन्हें साफ जवाब मिलता है—“अब नहीं बन पाएगा।”

हाथी प्रभावित क्षेत्र में खतरा
कोटया गांव हाथी प्रभावित क्षेत्र में आता है। ऐसे में खुले में शौच के लिए जाना ग्रामीणों के लिए जान जोखिम में डालने जैसा है। इसके बावजूद जिम्मेदारों की लापरवाही ने ग्रामीणों को मजबूर कर दिया है कि वे अपनी सुरक्षा दांव पर लगाएं।
फोटो खिंचवाकर निकाली राशि
ग्रामीणों का आरोप है कि शौचालय अधूरा होने के बावजूद पंचायत के जिम्मेदारों ने बाहर की फोटो खींचकर पूरा भुगतान निकाल लिया। बाद में थोड़ा बहुत रंग-रोगन कर शेष राशि भी आहरित कर ली गई।
सवाल यह है कि क्या सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन सिर्फ फोटो खिंचवाने तक सीमित रह गया है?

कोटया पंचायत बना भ्रष्टाचार का अड्डा
सूत्रों के अनुसार पंचायत सचिव और सरपंच ने मिलकर रिश्तेदारों और स्थानीय लोगों के नाम पर फर्जी बिल लगाकर भुगतान किया है। जनपद स्तर पर भी फर्जी सत्यापन कर लाखों रुपये की हेराफेरी की गई है।
हैरानी की बात यह है कि इन गंभीर आरोपों के बावजूद न जनपद पंचायत के अधिकारी कोई कार्रवाई कर रहे हैं और न ही जिला प्रशासन संज्ञान ले रहा है।
जब केंद्र सरकार गांव-गांव स्वच्छता पहुंचाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, तो आखिर सूरजपुर में योजनाएं कागजों और दीवारों तक ही क्यों सीमित हैं?
क्या जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ रिपोर्ट और फोटो देखकर ही संतुष्ट हो जाएंगे, या कभी जमीनी हकीकत भी देखेंगे?



