पांच साल की उम्र में छूटा मां-बाप का साया, दादी का सपना बना प्रेरणा — संघर्ष की मिसाल बनीं IPS अधिकारी

कहते हैं कि कठिन परिस्थितियाँ ही किसी व्यक्ति के असली हौसले की पहचान करवाती हैं। ऐसी ही प्रेरक कहानी है आईपीएस अधिकारी स्नेहा मिश्रा (काल्पनिक नाम) की, जिन्होंने बचपन में माता-पिता का साया खो देने के बाद भी हार नहीं मानी। पाँच साल की उम्र में जब अन्य बच्चे खेलकूद और परिवार के स्नेह में रहते हैं, तब स्नेहा ने जीवन के सबसे कठिन दौर का सामना किया। लेकिन उनकी दादी ने उन्हें न केवल संभाला, बल्कि उनका जीवन लक्ष्य भी तय कर दिया — “एक दिन तू पुलिस अधिकारी बनेगी और न्याय के लिए लड़ेगी।” यही दादी की आखिरी इच्छा स्नेहा की प्रेरणा बन गई।

छोटे से गाँव में पली-बढ़ी स्नेहा ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई सरकारी स्कूल से की। आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी, लेकिन पढ़ाई के प्रति उनका जुनून कभी कम नहीं हुआ। दादी ने हर हाल में उन्हें पढ़ाया, कभी खेतों में मजदूरी करके, तो कभी दूसरों के घरों में काम करके। स्नेहा बताती हैं, “दादी हमेशा कहती थीं कि पढ़ाई ही गरीबी से निकलने का रास्ता है। उनके शब्द मेरे जीवन का मंत्र बन गए।”

स्कूल में हर कक्षा में अव्वल आने वाली स्नेहा को शिक्षक भी विशेष प्रोत्साहन देते थे। दसवीं में टॉप करने के बाद उन्होंने छात्रवृत्ति के सहारे आगे की पढ़ाई पूरी की। स्नातक के दौरान ही उन्होंने सिविल सेवा की तैयारी शुरू कर दी। आर्थिक अभाव के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी — किताबें उधार लेकर पढ़ीं, बिजली जाने पर लालटेन की रोशनी में रातें बिताईं, और हर असफलता को अगले प्रयास की प्रेरणा बनाया।

पहले दो प्रयासों में असफल होने के बावजूद उन्होंने तीसरे प्रयास में सफलता हासिल की और आईपीएस बन गईं। जब चयन की खबर आई, तो उनके गाँव में उत्सव का माहौल था। लोगों ने कहा — “यह सिर्फ स्नेहा की नहीं, हर उस बेटी की जीत है जो सपने देखती है और उन्हें पूरा करने की हिम्मत रखती है।”

आईपीएस बनने के बाद स्नेहा ने सबसे पहले अपनी दादी की तस्वीर के आगे सलामी दी। उन्होंने भावुक होकर कहा, “आज अगर मैं यहां हूं तो सिर्फ दादी के कारण। उन्होंने मुझे सिखाया कि संघर्ष ही सबसे बड़ी ताकत है।”

आज स्नेहा मिश्रा एक जिले की एसपी हैं और महिला सुरक्षा, शिक्षा एवं बाल कल्याण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं। वे गरीब बच्चों के लिए एक निशुल्क शिक्षा अभियान भी चला रही हैं, ताकि कोई और बच्चा परिस्थितियों का शिकार न बने।

उनकी कहानी आज हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है — कि मुश्किलें चाहे जितनी बड़ी हों, अगर हौसले बुलंद हों और कोई अपने सपनों में सच्चा विश्वास रखे, तो सफलता निश्चित है।

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