हाथोर समाचार,अंबिकापुर। बलरामपुर जिले में भाजपा विधायक शकुंतला सिंह पोर्ते के कथित फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामले ने गुरुवार को बड़ा रूप ले लिया। प्रतापपुर विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित विधायक पर लंबे समय से फर्जी एसटी प्रमाण पत्र लेकर चुनाव लड़ने का आरोप लग रहा है। इसी विवाद को लेकर आज हजारों की संख्या में आदिवासी संगठनों और शिकायतकर्ताओं ने कलेक्टर कार्यालय बलरामपुर का घेराव कर उग्र प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि प्रशासन सत्ता के दबाव में कार्रवाई को टाल रहा है और लगातार सुनवाई की तारीख बढ़ाकर मामले को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है।

मामले से जुड़े लोगों का कहना है कि विधायक पोर्ते मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मऊ जिले की निवासी हैं, जहां गोंड जाति को ओबीसी में रखा गया है। उनका विवाह वाड्रफनगर के बहादुर सिंह से हुआ था और वर्ष 2002-03 में पति की जाति के आधार पर जारी एसटी प्रमाण पत्र को शिकायतकर्ताओं ने अवैध बताया है। इस मामले में शिकायत हाईकोर्ट तक गई, जहां से 17 जून 2025 को जिला स्तरीय जाति प्रमाण पत्र सत्यापन समिति गठित करने के निर्देश जारी किए गए थे। समिति द्वारा जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल रजिस्टर और वंशावली सहित मूल दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए भेजे गए तीन नोटिसों का विधायक ने अब तक कोई जवाब नहीं दिया है। बलरामपुर और अंबिकापुर के अभिलेखागारों में भी उनके मूल दस्तावेजों का कोई रिकॉर्ड नहीं मिलने की जानकारी सामने आई है।
आज, 27 नवंबर को निर्धारित सुनवाई के लिए विधायक को कलेक्टर कार्यालय में उपस्थित होने का आदेश था, लेकिन उनकी अनुपस्थिति से शिकायतकर्ताओं में नाराजगी फैल गई। उनके वकील द्वारा अगली तारीख 11 दिसंबर तक बढ़ाए जाने के बाद सर्व आदिवासी समाज और अन्य संगठनों ने कलेक्टर कार्यालय के बाहर नारेबाजी कर घेराव किया। प्रदर्शन देर शाम तक जारी रहा। संगठनों ने साफ चेतावनी दी कि यदि 11 दिसंबर को ठोस निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन और उग्र होगा।
शिकायतकर्ताओं की प्रमुख मांगों में विधायक का जाति प्रमाण पत्र निरस्त करने, उनकी विधायकी खत्म करने और कथित फर्जीवाड़े के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग शामिल है। शिकायतकर्ता धन सिंह धुर्वे का कहना है, “यह आदिवासी समाज के साथ धोखा है, हमारी आरक्षित सीट पर गैर-आदिवासी का कब्जा बर्दाश्त नहीं।”
वहीं ,अब सबकी नजरें 11 दिसंबर की सुनवाई पर हैं, जहां समिति द्वारा रिपोर्ट हाईकोर्ट को भेजने से पहले बड़ा फैसला हो सकता है। आदिवासी समुदाय का कहना है कि देरी से असंतोष बढ़ रहा है, जबकि भाजपा इस विवाद को राजनीतिक साजिश बता रही है।



